समुद्र तट पर
एक कॉटेज
—अज़र्बैजानी कहानी—
लेखक: रुस्तम इब्राहिमबेकोव
उसे सुबह आठ बजे तक मष्टगी पहुँचना था; और वहाँ से एक मज़दूर लेकर बिलग्या के कॉटेज साइट पर जाना था।
“मैं यह सब क्यों कर रहा हूँ?” पतलून पहनते हुए उसने सोचा।
“और वैसे भी—इस सब का क्या मतलब है?”
सोमवार तक उसे
आर्थिक प्रबंधन में स्थिरता पर अपना आर्टिकल पूरा करना था। पिछले कई वर्षों से
उसने अपने बैचलर फ़्लैट में एक कील तक नहीं ठोंकी थी और ऐसे में मष्टगी जाकर एक
कामगार तलाश करने और फिर उसे गाँव में कॉटेज की छत बनाने के लिए लेकर जाने के बारे
में सोचते हुए भी उसे कोफ़्त हो रही थी।
उसकी माँ भरे पूरे शरीर वाली महिला थीं। वे एक प्रशिक्षित इंजीनियर और कुशल प्रशासक रह चुकी थीं और अब एक विकलांग नागरिक के तौर पर पेंशन पाती थीं—उनके सीने में, दिल के पास, अक्सर दर्द रहता था…और पैरों में कुछ तकलीफ़ थी।
लगभग तीन साल
पहले उन्होंने अचानक फ़ैसला किया था कि उन्हें अपनी एक ज़मीन चाहिए, जिस पर वे खेती करना चाहती हैं। उन्होंने पहले कभी मिट्टी के प्रति ऐसा लगाव प्रदर्शित नहीं
किया था। एक ऊर्जावान और प्रोफ़ेशनल की तरह उन्होंने अपने करियर में दिए गए हर
दायित्व को समर्पित निष्ठा से निभाया था; इसलिए उनके पास कभी किसी और चीज़ के लिए समय
नहीं था।
लेकिन फिर
अचानक, एक दिन अपने
निर्णय की घोषणा करते हुए, उन्होंने ऐसी दृढ़ता से इसे
अमल में लाने की ठान ली… मानो वे जीवन-भर यह महत्वाकांक्षा पालती रही हों।
शुरुआती दिनों में वे अपने दोनों बेटों को भी अपने उत्साह में शामिल करने में
कामयाब रहीं।
उस समय वे बाकू
की फ़ोर्थ पैरेलल स्ट्रीट पर एक पुराने फ़्लैट में रहते थे—एक आकर्षक, प्यारा-सा
पुराना घर, जिसमें एक
खिड़की पास वाले घर की टूटी हुई कोलतार की छत को झाँकती थी, एक चरमराती हुई बालकनी,
मुलबैक पियानो
और लंबे गलियारे में फैला दुनिया का पॉलिटिकल मैप।
वह उस समय 27
वर्ष का था और
उसका बड़ा भाई, जो प्रसिद्ध यूरोलॉजिस्ट था, 30 वर्ष का था।
एक दिन माँ
उत्साह से भरी घर आईं और गलियारे में दुनिया के पॉलिटिकल मैप के नीचे रखे लकड़ी के
संदूक पर बैठ गईं। अपनी साँस सामान्य होने की प्रतीक्षा किए बिना, अपनी
ब्रॉन्कियल खाँसी के बीच, उन्होंने किसी एक गाँव में कॉटेज बनाने के अपने इरादे के
बारे में बताया।
कई हफ़्तों के
बाद, जब उन्होंने
ज़मीन का कारोबार करने वाले एक ट्रस्ट के माध्यम से नोवखानी से दूर अपशेरोन
प्रायद्वीप पर कॉटेज के लिए ज़मीन खरीद ली, तो परिवार की बातचीत में हर
दिन कॉटेज का ज़िक्र होने लगा—“एक बरामदे वाला आरामदायक छोटा सफ़ेद रंग का घर,
चारों ओर अंगूर
की बेल।”
सुबह सबके काम
पर जाने से पहले और फिर शाम को, रात के खाने के बाद, उन्हें समुद्र के किनारे
अपने भावी कॉटेज पर बात करने में बहुत मज़ा आता। माँ घर बनाने के बारे में विस्तार
से बतातीं—उसमें खोदे जाने वाले कुएँ के बारे में, जिसमें मोटर लगानी होगी;
पाले गए चूज़ों
के लिए एक कॉप बनाना होगा।
उन्होंने घर के
लिए हर छोटी-से-छोटी बात का ख़याल रखते हुए अंतिम डिज़ाइन तैयार किया और हम दोनों
भाई सपना देखते कि गर्मी के किसी एक दिन कॉटेज पर पहुँचकर, एक-एक मुर्गे की दावत
उड़ाकर हम जल्दी से समुद्र में तैरने के लिए दौड़ गए हैं।
जब गर्मियाँ आ
गईं, तो यह स्पष्ट
हो गया कि इस परिवार के लिए कॉटेज बनाने का ख़याल पूरी तरह से यूटोपियन था। हमने
अपनी क्षमता को कुछ ज़्यादा ही आँक लिया था: बहुत कुछ ऐसा था जो न हम जानते थे और
न कर सकते थे। इसके अलावा, माँ को छोड़कर हम में से कोई भी इस योजना पर काम करने के
लिए समय नहीं निकाल पाया; सभी अपने-अपने मसलों में व्यस्त थे। मैदान छोड़ने वालों में
सबसे पहला मेरा बड़ा भाई था—और वह भी तब, जब ज़रूरी पत्थर और सीमेंट पहले ही बिल्डिंग
साइट पर ले जाए जा चुके थे।
उस दिन पत्थर
के ब्लॉक लादकर ले जा रहा ट्रक बिल्डिंग साइट से लगभग 300 मीटर दूर रेत में फँस गया।
कई घंटों की मशक्कत के बाद, चिलचिलाती और तपती धूप के बीच, वे उसे बाहर निकाल पाए।
फिर उन्होंने,
अँधेरा होने से
पहले काम ख़त्म करने के लिए, बिना रुके पत्थर के ब्लॉकों को साइट पर पहुँचाया। सभी ने
दो-दो ब्लॉक उठाए—इससे अधिक उठाना संभव नहीं था—पसीने में नहाए, चिलचिलाती रेत
पर चलकर, जिसमें उनके
पैर बार-बार धँस जाते, उन्हें वे बिल्डिंग साइट तक ले गए।
साँस की तकलीफ़
और सीने के दर्द के बावजूद माँ ने भरसक उनका साथ दिया। उनके पास एक ब्लॉक से अधिक
उठाने की ताक़त नहीं थी और वे बार-बार रुकते हुए धीरे-धीरे ही आगे बढ़ सकती थीं,
लेकिन कोई भी
उन्हें उस एक ब्लॉक को छोड़ देने के लिए नहीं मना सकता था। कभी-कभी वे बोझ और थकान
से हाँफते, निस्तेज होकर
रेत पर बैठ जातीं।
उसी दिन उसके
बड़े भाई ने सबको बताया कि अगले कुछ हफ़्तों में वह अपने शोध-प्रबंध में बहुत
व्यस्त रहेगा और इस वजह से बिल्डिंग साइट पर नहीं आ सकेगा।
माँ उस रात
रोईं—वह और उसके पिता उनसे कुछ मीटर की दूरी पर लेटे थे और कंबल से दबी हुई उनकी
सिसकियाँ उन्हें सुनाई पड़ती रहीं। लेकिन सुबह माँ ने बिना कुछ कहे दो ब्लॉक उठाए
और बिल्डिंग साइट पर ले जाने लगीं।
अगले दिन माँ
ने एक बूढ़े राजमिस्त्री—जो पास ही में रहता था—को काम पर रखा और निर्माण-कार्य
शुरू कर दिया। बूढ़े मिस्त्री का 12 साल का पोता एक छोटे से गधे पर पानी और पत्थर
पहुँचाने लगा और माँ खुद सीमेंट-मिक्स तैयार करतीं। राजमिस्त्री ब्लॉक बिछाता।
उसके पिता—जो
पेशे से दार्शनिक थे—सबके लिए भोजन तैयार करते। वे और कोई योगदान करने में सक्षम
नहीं थे; न तो रुचि और न
ही उनका स्वास्थ्य उन्हें इसकी इजाज़त देता था।
कभी पैसे की तो
कभी ज़रूरी सामान की कमी, और फिर कभी ख़राब सड़कों से लगातार बाधित, कॉटेज का
निर्माण धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया: प्लॉट के चारों ओर एक बाड़ लग गई, एक कुआँ खुद
गया, जिसमें पहले ही
दिन कई बाल्टियाँ पानी जमा हो गया, और कॉटेज की दीवारें ऊपर उठने लगीं।
और अब, आज मंसूर
को—उसका यह नाम उसके दिवंगत दादा के नाम पर रखा गया था—आठ बजे तक मष्टगी पहुँचना
था, एक कामगार
ढूँढना था और उसे लेकर कॉटेज की छत बनाने के लिए साइट पर जाना था।
उसने अपनी
पतलून पहनी, राइटिंग डेस्क
पर गया और कल लिखे गए आर्टिकल का अंतिम वाक्य पढ़ा। उसे वह वाक्यांश निहायत ही
बुरा लगने लगा। “मैं यह क्यों कर रहा हूँ?” उसने फिर कुढ़ते हुए अपने आज
के दिन किए जाने वाले कामों के बारे में सोचा। सात बज चुके थे। उसके पास हजामत
बनाने के लिए दस मिनट बचे थे।
वह बाथरूम से
हैंड-मिरर ले आया, खिड़की के पास बैठ गया और शेवर को प्लग में लगाने से पहले,
पंद्रहवीं बार
निश्चय किया कि कल वह एक वॉल-मिरर खरीद ही लेगा।
जब उसने हजामत
बना ली, तो मंसूर ने
अपने बड़े भाई को फ़ोन किया, जो अभी भी सो रहा था, और उसे दो बजे तक इंतज़ार
करने के लिए कहा।
“मैं बस उस आदमी
को वहाँ ले जाऊँगा और वापस आ जाऊँगा। मैं भी अब इस सब से आजिज़ आ चुका हूँ।” कहते
हुए मंसूर ने बड़े भाई को बिल्डिंग साइट की स्थिति के बारे में बताया और उसके साथ
इस पर सहमति व्यक्त की कि माँ का स्वास्थ्य उन्हें वहाँ अकेले रहने की इजाज़त नहीं
देगा, और पिता पर
निर्भर रहने का कोई फ़ायदा नहीं था—क्योंकि एक बार जब वे शहर आ जाते, तो आप उन्हें
एक हफ़्ते से पहले वापस कॉटेज में नहीं पाएँगे।
“यह पूरी तरह से
समय और पैसे की बर्बादी है,” उसके भाई ने अपना निष्कर्ष दिया। “उस कॉटेज के लिए इतनी
झंझट, और वे वहाँ
वैसे भी नहीं रह पाएँगी।”
मंसूर ने फ़ोन
रख दिया और सोचा कि उसका भाई कितना भाग्यशाली है—सब झंझटों से दूर और मुक्त।
बिल्डिंग साइट की ज़िम्मेदारियों से भाग खड़े होने के बावजूद वह जल्दी ही फिर से
माँ का कृपा-पात्र बन गया था। वह कभी-कभार शाम के वक़्त पाँच मिनट के लिए अपनी
उपस्थिति दर्ज कराता, कोई मामूली-सा उपहार ले आता, माँ का हाथ चूमकर अपनी
विवशता दर्शाता कि वह बहुत व्यस्त है, और वापस शहर निकल जाता। वह वाक़ई जानता था कि
खुद को कैसे प्रस्तुत करना है।
मंसूर ने
मष्टगी का सफ़र बस से तय किया—पहुँचते ही उसे मिस्त्री मिल गया, और वे कॉटेज की
ओर चल पड़े।
उसके दाहिनी ओर
सूरज तप रहा था। मिस्त्री मज़े से उसके साथ लगभग दौड़ता हुआ चल रहा था। वह बीच-बीच
में रुककर धूल से सने अपने जूतों से रेत निकालने के लिए उन्हें हिलाता। मंसूर भी
रुक जाता और इंतज़ार करता, जब तक कि वह फिर से चलना शुरू न कर दे।
मिस्त्री के
चौड़े पैरों के बढ़े हुए नाखून मोटे और चौकोर थे। उनका रंग मंसूर के चश्मे के गहरे
हॉर्न-फ़्रेम जैसा था।
मंसूर अपने आज
के दिन के बारे में सोच रहा था। वह किसी भी तरह दो बजे तक शहर वापस आ जाएगा। उसके
भाई ने कुछ दोस्तों के साथ सत्तार-ज़ादे से मिलने की व्यवस्था की थी, जो लंबे समय से
उसे अपनी एक नई पेंटिंग देने का वादा कर चुके थे। मंसूर को उसके साथ—सत्तार-ज़ादे
को उनके उस वादे के बारे में याद दिलाने के लिए—जाना ज़रूरी था। उसके भाई को
पेंटिंग्स में कोई रुचि नहीं थी और उसे खुद कभी पेंटिंग माँगने के बारे में याद
नहीं रहेगा। और इस प्रसिद्ध कलाकार की पेंटिंग हासिल करने का अवसर दोबारा जल्दी
नहीं आएगा।
जब वे पहुँचे तो माँ अंगूर की बेल के चारों ओर खुदाई कर रही थीं।
“तुम आ गए,” उसने रुखाई से
कहा, फिर मिस्त्री
को गहरी छानबीन भरी निगाह से देखा। जाहिर तौर पर वह आज फिर उखड़ी हुई लग रही थीं।
पिता अस्थायी लकड़ी के शेल्टर के नीचे बैठे किताब पढ़ रहे थे। कोई दूसरी किताब उपलब्ध न होने की सूरत में वे एक ही किताब कई बार पढ़ सकते थे।
छोटे कद का यह दुबला-पतला आदमी, जो हर विषय में अपनी पत्नी की बात सुनता था और न जाने कब से उस दिन को भूल चुका था जब किसी मसले पर उसकी अपनी कोई राय होती थी, उन्हें केवल इस एक बात—कॉटेज बनाने के काम में मदद करने—पर राज़ी नहीं किया जा सकता था। वह सिर्फ़ एक काम करते थे—खाना बनाना और बर्तन धोना।
एक थकी साँस
लेकर कराहते हुए मंसूर वहाँ पड़ी लोहे की दो चारपाइयों में से एक पर धम्म से बैठ
गया। यहाँ छाँव में आकर उसे अचानक लगा कि तपती धूप में मष्टगी से
बिलग्या के सफ़र ने उसे कितना थका दिया है।
माँ अब तक मिस्त्री के साथ छत पर चढ़ चुकी थीं।
“पहले आप इन्हें बिछाते हैं,” माँ स्पष्ट रूप
से समझा रही थीं—उनका काम करने वालों के साथ बात करने का यही तरीक़ा था—“फिर टार्ड
फ़ेल्ट उसके ऊपर से नीचे चला जाएगा, इसके बाद आप कीलों से इन्हें फ़िक्स कर देंगे और
सीमेंट से ढक देंगे। समझे?”
“इसमें क्या
मुश्किल है, जैसे कि मैंने
पहले कभी ऐसी छतें नहीं बनाई हैं,” मिस्त्री ने खीझे स्वर में कहा।
“मुझे नहीं पता
कि आपने पहले किस तरह की छतें बनाई हैं, लेकिन इसे ठीक से बनाना है। बजरी के बजाय रेत का
इस्तेमाल करने की कोशिश मत करना। मुझे सब पता चल जाएगा।”
“रेत से आपका
क्या मतलब है?” उसने आश्चर्य से पूछा।
“मैं तुम लोगों को ख़ूब जानती हूँ,” माँ ने उत्तर दिया और छत से नीचे उतरने लगीं।
कोई भी काम करने वाला उन्हें एक दिन से अधिक बर्दाश्त नहीं कर पाता था।
अभी तीन हफ़्ते पहले शाम को वहाँ आते हुए मंसूर ने एक झगड़ालू किस्म के मज़दूर को घर के पीछे खड़े पाया था; वह आसमान की ओर हाथ उठाकर दुआ कर रहा था:
“या खुदा, मुझे इस औरत से निजात दिला!”
“ठीक है,
फिर मैं चलता
हूँ,” मंसूर ने कहा।
“कहाँ?” आश्चर्य से
उसके पिता ने पूछा।
उनके गंजे सिर
पर शेल्टर की दीवार की दरार से अंदर आती एक छोटी धूप की किरण चमक रही थी; ऐसा लग रहा था
जैसे उसे पॉलिश किया गया हो। उन दोनों ने बनते हुए कॉटेज की दिशा में देखा। माँ छत
पर से झुके मिस्त्री को कुछ तख़्ते पकड़ा रही थीं। वह उन्हें ऊपर खींचकर छत पर
अपने पास रख रहा था।
मंसूर ने सोचा,
“निकलने का यह
सही समय है।”
“उसेन-बाला आ
रहा है,” नज़र कमज़ोर
होते हुए भी उसके पिता ने दूर से ही पहचानते हुए कहा। “अब आई मुसीबत।”
“क्यों... क्या हुआ?” मंसूर ने पूछा।
“हमारा हथौड़ा
दो दिन से गुम है।”
उसेन-बाला
आस-पास के सभी घरों के लिए चौकीदार था। “अस्सलाम वालेकुम!” तारों वाली बाड़ के पास
पहुँचकर उसेन-बाला चिल्लाया।
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। पिता ने न सुनने का बहाना करते हुए अपनी किताब में मुँह छिपा लिया।
“वालेकुम
अस्सलाम,” मंसूर जवाब में
चिल्लाया।
उसेन-बाला कुछ
देर तक बाड़ के पास खड़ा रहा, फिर किसी के बुलाने का इंतज़ार किए बिना बाड़ की तारों के
बीच से जैसे-तैसे अंदर आ गया।
माँ बिना कुछ
कहे अपना काम करती रहीं और उसकी ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखा। “बैठो,” मंसूर ने अपने
पैर समेट लिए ताकि उसेन-बाला चारपाई के किनारे पर बैठ सके।
पिता ने महसूस
करते हुए कि तूफ़ान अब कभी भी आ सकता है, अपनी निगाह किताब में और गहरे गड़ा ली।
“मैंने कल रात
कितना दिलचस्प सपना देखा,” उसेन-बाला ज़ाहिर तौर पर बेख़बर दिखते हुए बोला, “मैंने सपना
देखा कि मैं घर पर अकेला सो रहा था, और अचानक कोई मुझे जगाने लगा। जब मैं उठा,
तो मैंने देखा
कि यह शैतान था। वह मुझे कंधे से हिला रहा था। ‘उठो,’ वह बोला, ‘बहुत सो चुके,
उसेन-बाला,
तुम मेरे साथ
चल रहे हो। तुम इस दुनिया में अपना वक़्त पूरा कर चुके हो।’ मेरा दिल डूब गया।
मैंने सोचा, उसेन-बाला,
सब ख़त्म हो
गया—मेरे हाथ-पैरों को जैसे लकवा मार गया, मैं लाश की तरह पड़ा रहा। और अचानक, मैं ख़ुद नहीं
जानता कि मुझे कहाँ से ताक़त मिली, मैं जोर से चिल्लाने लगा—ठीक उसके चेहरे पर। वह उछला और
सीधे दरवाज़े की तरफ़ गोली की तरह लपका। वह इतनी जल्दी में था कि उसने अपना सिर
लिंटेल से टकरा दिया। कितनी जोर की गड़गड़ाहट थी!... और फिर मैं जाग गया...”
“और उसके बाद वो
शैतान आराम से यहाँ आ जाता है, आकर बैठ जाता है जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं है और हर तरह की
बकवास करता है, ताकि मैं हथौड़ों और बोर्डों पर नज़र न रख पाऊँ,” माँ ने पिता की
ओर मुड़ते हुए कहा।
“माँ!” मंसूर ने
तिरस्कारपूर्वक कहा। “बहुत हो गया।”
लेकिन माँ ने पहले ही एक निर्णायक आक्रमण शुरू कर दिया था। रूसी भाषा छोड़कर अज़रबैजानी भाषा में बोलते हुए, उन्होंने उसेन-बाला पर हथौड़ा चोरी करने का इल्ज़ाम लगाया।
“उठकर खड़े हो
जाओ!” उन पर चिल्लाईं। “मुझे यहाँ दिखना मत जब तक तुम वो हथौड़ा वापस न कर दो।”
“आप मेरे साथ
ज़्यादती कर रही हैं, दिल्यारा-ख़ानम,” उसेन-बाला ने विरोध किया, “मैंने आपका
हथौड़ा नहीं लिया। मेरे बच्चे भूखे रह जाएँ अगर मुझे पता हो कि हथौड़ा किसने लिया
है।”
वह सच बोलता लग
रहा था। यहाँ तक कि माँ को भी अपने आरोप के सच होने पर संदेह होने लगा था, लेकिन अब पीछे
नहीं हटा जा सकता था, और जैसे ही उसेन-बाला चला गया, वे—मानो ख़ुद को आश्वस्त
करने के लिए—उसेन-बाला को बेईमान साबित करने के लिए कुछ और बेजा दलीलें देती रहीं।
उसेन-बाला के
साथ हुई घटना ने मंसूर के इस विचार को और पुष्ट कर दिया कि माँ पूरी तरह से सनक गई
थीं। पिछले पूरे एक साल से वे इस आदमी के साथ दोस्ताना व्यवहार करती रहीं, उसके साथ चाय
पीती रहीं, उसके साथ अपना
सुख-दुख बाँटती रहीं, उसके बच्चों के लिए नौकरी की व्यवस्था की और अब एक मामूली
से हथौड़े की वजह से उसका इतना अपमान कर दिया था।
“माँ, तुम चोट लगवा
लोगी!” मंसूर अचानक अपनी माँ के पास दौड़ा। उन्होंने एक भारी बोर्ड उठाने का
प्रयास करते हुए माँ को लगभग धकेलते हुए बोर्ड ख़ुद उठा लिया। अचानक बोर्ड उठा
लेने की वजह से उसकी पीठ में तेज़ दर्द उठ आया; उसने माँ से लेकर उस भारी
बोर्ड को मिस्त्री को पकड़ा दिया।
“मैं ख़ुद इसे आराम से उठा लेती,” उसकी माँ ने हठपूर्वक कहा और दूसरे बोर्ड को उठाने लगीं।
“आपको क्या लगता
है आप क्या कर रही हैं, ख़ास तौर पर मुझे क्यों परेशान कर रही हैं?” मंसूर ने पूछा।
“क्यों?”
उन्होंने
आश्चर्य से उत्तर दिया। “मैं क्या कर रही हूँ?” माँ ने अपनी हठीली भूरी
आँखों से मंसूर की ओर देखा; उन आँखों में एक बेवजह और पागल आस्था, अपने सही और
निर्दोष होने का विश्वास दिख रहा था। मंसूर बमुश्किल ख़ुद को माँ से घृणा करने से
रोक पाया।
आदतन धीरे चलने वाला उसेन-बाला आज के अपमान के बाद और भी धीरे चल रहा था और अभी बहुत दूर नहीं जा पाया था। मंसूर को पीछे से आता देख वह सड़क की दूसरी ओर से कुछ कदम चलकर उसकी तरफ़ आ गया।
“मैं अपनी जान
की क़सम खाता हूँ मंसूर भाई, मैंने हथौड़ा नहीं लिया,” उसने निस्सहाय मुद्रा में
अपने हाथ दाएँ-बाएँ फैलाते हुए कहा।
मंसूर ने उसे
जैसे-तैसे आश्वस्त किया और अपनी माँ के व्यवहार के लिए क्षमा माँगी। उसने उसी क्षण
दृढ़ता से निश्चय कर लिया कि वह तुरंत वापस चला जाएगा और फिर यहाँ कभी नहीं आएगा।
एक बार फिर उसने अपने पिछले निष्कर्षों पर सोचा: कॉटेज बनाने की धुन में निश्चित
रूप से उसकी माँ का दिमाग़ हिल गया था; जिस ज़िद और जुनून के साथ वे अपनी क्षमता से परे
इस काम में लगी थीं, उन्हें किसी तरीक़े से नहीं समझाया जा सकता था। वे अच्छी
तरह जानती थीं कि उनका पति या ही उनके बेटे—कोई भी उनके साथ यहाँ नहीं रह पाएगा,
और ख़ुद उनकी
सेहत की जो हालत थी उसमें यहाँ अकेले रहना ख़तरनाक था: यह बात उनके डॉक्टर और
क़रीबी बार-बार कहते थे। फिर भी वे बिना रुके कॉटेज के काम में लगी थीं। वे ख़ुद
को हद से ज़्यादा हलकान कर रही थीं, कर्ज़ में डूबी चुकी थीं, अपनी ज़िद और शान में
उन्होंने इस सजावटी कॉटेज का निर्माण जारी रखा, जो अंत में उन्हें बर्बाद
कर देने वाला था। उसे भी अपने भाई की तरह इस काम से ख़ुद को अलग कर लेना चाहिए।
उसे इस दु:साहस में साथ नहीं देना चाहिए जो उसकी माँ को बर्बाद कर रहा है। कम से
कम वह ख़ुद इसका हिस्सा होने से तो बच ही सकता है!
पिता पढ़ते
रहे। माँ हाथ में हथौड़ा लिए रेत पर बैठी थीं और एक बड़े पत्थर को छोटे-छोटे
टुकड़ों में तोड़ने की कोशिश कर रही थीं। वे धूल से अँटी हुई थीं।
पसीने और धूल ने उनके चेहरे पर जैसे गाढ़ी, भूरे रंग की परत जमा दी थी
और वह कई तरह के पैटर्न में फैल गई थी।
मंसूर घर में
अंदर चला गया। कामगार पहले ही छत को बोर्ड से ढक चुका था। कई जगहों पर उसने टार को
नीचे की ओर लगा दिया था, जिससे दरारें ढँक गई थीं। मंसूर ने गैस के चूल्हे के पास
दूसरी चीज़ों के बीच में अपनी पतलून को ढेर में पड़े देखा; उसने पतलून को उठाकर एक
पुराने अख़बार में लपेट लिया।
पिता ने कमरे में झाँका।
“तुम क्या कर रहे हो?”
“मैं शहर जा रहा हूँ।”
“क्या तुम उनकी मदद नहीं करोगे?”
“नहीं।”
पिता उदास होकर मुस्कुराए। मंसूर ने अपनी पतलून वाले पैकेट के चारों ओर एक डोरी बाँधी।
“तुम कुछ खाओगे नहीं?” उसके पिता ने पूछा।
“नहीं। आपको मालूम है मेरे सैंड शूज़ कहाँ हैं?”
“बरामदे में।”
पिता चप्पल लेने गए। मंसूर खिड़की के पास गया। माँ अब भी जमकर पत्थर पर चोट करती जा रही थीं।
“क्या, वह जा रहा है?” उन्होंने पिता से पूछा।
“उसे शहर में
कोई ज़रूरी काम है,” पिता ने समझाया।
उन्होंने कुछ
नहीं कहा, केवल पत्थर पर
ज़ोर से एक प्रहार किया, फिर दूसरा, पर उतना कठोर नहीं। पत्थर आधा रेत में धँस चुका था।
उन्होंने इसके नीचे एक और पत्थर रखने के बारे में नहीं सोचा। पर शायद उन्हें इस
बात में कोई दिलचस्पी नहीं थी कि वह टूटता है या नहीं। शायद उन्हें पत्थर पर
प्रहार करने में एक तसल्ली मिल रही थी। या हो सकता है कि तसल्ली न मिल रही हो
लेकिन इसकी ज़रूरत महसूस हो रही हो। वे ज़ोर-ज़ोर से साँस ले रही थीं और कई प्रहार
करने के बाद वे पीछे हट गईं; उनका भारी शरीर मुँह को पूरा खोलकर ज़्यादा हवा पाने की
कोशिश कर रहा था।
तीन साल पहले मंसूर ने उन्हें ऐसे करवट लिए लेटे देखा था एक भारी पत्थर के बग़ल में, लगभग घिसटते हुए जैसे वे रेंग रही थीं। वह तब बहुत डर गया था:
“क्या बात है, माँ? तुम ज़मीन पर क्यों लेटी हो?”
“ऐसे लेटने से आराम मिल रहा है,” उन्होंने बताया, “इस तरह से
लेटने से मेरे पैरों में दर्द नहीं होता।”
जीवन में पहली
बार माँ ने अपनी कमज़ोरी को स्वीकार किया था। वह तब लगभग रो पड़ा था।
इस वक़्त माँ
के लिए उसकी हमदर्दी इतनी ज़्यादा नहीं थी। लेकिन फिर भी अपनी कमज़ोरी और बच्चों
के प्रति क्षोभ को छिपाने के लिए उन्हें पत्थर को पीटते हुए देखना पीड़ादायक था।
“माँ,” मंसूर ने
खिड़की से पुकारा, “तुम इसे ग़लत तरीक़े से कर रही हो। तुम्हें एक पत्थर नीचे
रखना चाहिए।”
कहने के बाद उसने महसूस किया कि उसे यह नहीं कहना चाहिए था, अगर वह वास्तव में आज सत्तार-ज़ादे की पेंटिंग पाना चाहता था।
“मैंने कोशिश की थी,” उन्होंने थोड़ा रुककर,
जैसे सोच रही
हों कि जवाब देना ज़रूरी है या नहीं, कहा। “यह बार-बार फिसल जाता है।”
मंसूर बाहर आया और उनके पास चला गया। उन्होंने पत्थर को पीटना बंद कर दिया, लेकिन हथौड़े को अपने हाथ से नहीं निकलने दिया। वे इंतज़ार कर रही थीं कि वह क्या कहेगा।
“तुम जो चाहो,
कर सकते हो,”
माँ के हाव-भाव
जैसे उससे कह रहे थे, “मैं अपने बच्चों से किसी भी व्यवहार के लिए तैयार हूँ...”
मंसूर भी चुप
रहा। फिर से उसके दिमाग़ में यह विचार आया कि अगर वह जाना चाहता है तो उसे यह अभी
कहना होगा, इसी मिनट,
वरना बहुत देर
हो जाएगी।
“मिस्त्री वहाँ क्या कर रहा है?” उसने उनकी ओर देखे बिना पूछा।
“मुझे नहीं मालूम,” उन्होंने थके
हुए स्वर में जवाब दिया, फिर एक विराम के बाद कहा, “मैं अभी ऊपर चढ़कर देखती
हूँ।”
“मैंने नीचे से देखा था, उसने छत के बोर्ड काफी अच्छी तरह से लगाए हैं,” मंसूर ने कहा।
“अहम बात यह देखना है कि वह बजरी के बजाय रेत का इस्तेमाल न करे।”
“ओह माँ, छोड़ो भी! वह उस तरह का नहीं लगता...”
मंसूर ने
पत्थरों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ना शुरू कर दिया—अब उसे यह अंदाज़ा हुआ कि
कम से कम 50 बाल्टियाँ छोटे
टुकड़ों की ज़रूरत होगी—फिर सीमेंट मिक्स के लिए रेत ले ली। और फिर, देर शाम,
छत पर सीमेंट
पकड़ाना शुरू कर दिया। कई फावड़े मिक्स को बाल्टी में डालकर, वह दीवार पर
लगी लकड़ी की सीढ़ी पर चढ़ गया और उसे काम करने वाले को पकड़ाता रहा, जिसने मिक्स को
बजरी की एक सपाट परत पर उलट दिया। मंसूर को वहीं रुकना था और उसकी माँ भी फावड़ा
लेकर बाल्टी में मिक्स भरकर उसे पकड़ा देती थीं ताकि काम में कोई रुकावट न आए।
सूरज अभी भी आसमान में काफी ऊपर था और उसकी जलती हुई किरणें धधक रही थीं।
मिस्त्री ने
धूप से बचने के लिए अपने सिर के चारों ओर अपनी कमीज लपेट ली थी। उसने अपना फावड़ा
चलाते हुए मंसूर से कहा, “अपशेरोन पर सूरज बहुत ज़ालिम हो सकता है; यह आपको पागल
कर सकता है। मुझे याद है कि घेरादिल का एक स्थानीय व्यक्ति मुझे बता रहा था कि जब
वह खदान से ट्रक पर रेत ले जा रहा था तो क्या हुआ था। वह दिन में 20-30 चक्कर लगाता
था। एक दिन वह घर आया—उसकी माँ नहीं थी और दरवाज़े पर ताला था। उसने ट्रक को गली
में खड़ा किया और बाड़ की छाया में बैठ गया। सूरज एकदम तप रहा था। चारों ओर
सन्नाटा था। वहाँ कोई नहीं था—केवल पड़ोसी का खच्चर, जो गेट से बंधा हुआ था और
उसे देख रहा था। वह वहाँ बैठकर इंतज़ार कर रहा था। फिर अचानक, बिना किसी वजह
के, वह उठ गया।
खच्चर को अपने ट्रक के पीछे लादकर चला गया। वह पूरी तरह से अपने होश खो चुका था और
उसे पता नहीं था कि वह क्या कर रहा था। खच्चर का मालिक उसके पीछे भी दौड़ा
लेकिन... सीधे वह मष्टगी के बाज़ार में गया। खच्चर को एक बड़ी रक़म में बेच दिया।
आज तक वह समझ नहीं पाया कि उसने ऐसा क्यों किया... धूप ने उसे पागल कर दिया था।”
शाम को जब सूरज
आधे से अधिक नीचे समुद्र में उतर चुका था, एक बाल्टी का हैंडल टूट गया। मंसूर उस समय छत पर
काम कर रहा था और मिस्त्री हैंडल को फिर से लगा रहा था तो उसे थोड़ा आराम करने का
मौका मिला। वह अपने पेट के बल नए लगाए एक पत्थर के किनारे पर लेट गया; उसका चेहरा छत
के बिल्कुल किनारे पर था। अत्यधिक श्रम करने से गर्म हुआ उसका चेहरा जैसे जल रहा
था। उसने अपना चेहरा एक खुरदुरे पत्थर पर टिका दिया जो अब थोड़ा ठंडा हो गया था।
वास्तव में, या यह कहना सही
होगा कि उसकी थकी गर्दन अब उसके सिर का वज़न नहीं उठा पा रही थी और उसका चेहरा
पत्थर पर अपने ही वज़न से टिक गया था।
नीचे मिस्त्री
अभी भी बाल्टी के हैंडल को ठीक करने का निरर्थक प्रयास कर रहा था। माँ नज़र रखने
के लिए उसके पास रेत पर बैठ गईं। ऊपर छत से वे काफी हद तक उसकी दिवंगत दादी की तरह
लग रही थीं। मिस्त्री से बकेट का हैंडल ठीक नहीं हो रहा था और उसे ठीक करने में
काफी समय लगा। धीरे-धीरे मंसूर की थकान कम होने लगी। अपनी माँ को देखकर उसे बरसों
पहले का वह समय याद आ गया जब वे पीरशागी में दादी के साथ ऐसे ही एक बिना छत के घर
में रहते थे। यह लड़ाई का समय था। माँ रोज़ रात को शहर से आते हुए खाना भी लातीं।
जब वे नहीं ला पातीं, तो दादी ब्रेड काटने वाले चाकू पर चिपके रह गए ब्रेड के
टुकड़ों को निकालकर उन्हें देती थीं जो वह और उसका भाई आपस में बाँट लेते थे।
दादी हाल ही
में गुज़र गई थीं, लेकिन वह उनकी स्मृति में उसी तरह रह गई थीं जैसे वे
पीरशागी में उस युद्ध के दौरान थीं। माँ अब उनके जैसी हो गई थीं। उन वर्षों में
माँ सुंदर दिखती थीं। या हो सकता है कि तब उसे वे सुंदर लगती थीं।
माँ उन्हें
किताब पढ़कर सुनाना पसंद करती थीं। मंसूर को अब एहसास हुआ कि वास्तव में उन्होंने
ख़ुद बहुत ज़्यादा नहीं पढ़ा था। लेकिन तब उसे इस बात का पता नहीं था। उनकी कई
पसंदीदा किताबें थीं: रॉब रॉय, द लिटिल ट्रैम्प, ओलिवर ट्विस्ट और द लिटिल लेडी ऑफ़ द बिग हाउस।
...वे पहली मंज़िल पर अपने फ़्लैट की लंबी खुली बालकनी में
बैठते थे, जिसमें से एक
सीढ़ी नीचे उतरती थी और जहाँ पर बालकनी सीढ़ियों से जुड़ती थी वहाँ उसने अपने लिए
बैठने की जगह बना ली थी। और वहाँ बैठकर वह घंटों ओलिवर ट्विस्ट की कहानी सुना
करता...
वह थोड़ी देर के लिए गहरी नींद सो गया होगा, क्योंकि जब उसने अपनी आँखें खोलीं तो माँ को अपने पास देखा। वे भी छत के किनारे बैठी थीं।
“क्या बात है?” उन्होंने पूछा। “क्या कुछ दुख रहा है?”
“नहीं,” उसने कहा,
“यूँ ही ज़रा
आँख लग गई थी।”
वे कुछ देर चुप
रहीं और फिर बिना उसकी ओर देखे अनिश्चित स्वर में पूछा, “सर में दर्द हो रहा है?”
“थोड़ा-बहुत।”
वे शायद
शर्मिंदा थीं और इसलिए झिझक रही थीं। उनका सिर पत्थर की कगार से उठाकर अपनी गोद
में रखने से पहले जैसे सोच रही हों कि वे यह करें या नहीं।
फिर कहने से
पहले झिझकते हुए उसकी ओर देखे बिना पूछा, “तुम चाहो तो मैं तुम्हारे सिर की मालिश कर दूँ?”
“कर दो,”
मंसूर ने कहा।
वे प्यार से
उसकी कनपटी और माथे को सहलाने लगीं। उनकी उंगलियों के सिरों की त्वचा खुरदरी थी।
मंसूर आँखें बंद करके लेटा था। माँ की साँसें आवाज़ कर रही थीं और उनका बड़ा ढीला
पेट, जो उसके सिर से
लगा हुआ था, निरंतर उठकर
गिर रहा था। पिछले कुछ वर्षों में वे काफी बूढ़ी हो गई थीं मानो एकदम से... उसने
सोचा।
“माँ, क्या आपको याद
है कि आप मुझे ‘ओलिवर ट्विस्ट’ पढ़कर सुनाया करती थीं?” बिना आँखें खोले मंसूर ने
पूछा। “मुझे याद है।”
उन्होंने मंसूर
की कनपटी और माथे पर सहलाना जारी रखा। वह आँखें बंद करके लेटा, सोचता रहा।
बेशक, एक दृढ़
चरित्र—जैसा कि कुछ लोग होते हैं—होना अच्छी बात है, लेकिन उदार होना भी इतना
बुरा नहीं है। ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि व्यक्ति जो कुछ भी करे वह हमेशा तर्कसंगत
और सोचे-समझे लक्ष्य की दिशा में हो। ऐसे भी हालात होते हैं जब आप कुछ ऐसा करते
हैं जो लंबे समय से आपके लिए अपना अर्थ खो चुका होता है लेकिन आप इसे करना जारी
रखते हैं क्योंकि जिन लोगों से आप प्यार करते हैं वे उसमें विश्वास करते हैं और वे
अभी नहीं समझते, जो कि आपने पहले समझ लिया है। वे आपकी दृष्टि से ग़लत हो
सकते हैं, और उनके कष्ट
आपको व्यर्थ लग सकते हैं, लेकिन अगर आप उन्हें प्यार करते हैं तो उन्हें अपने हाल पर
छोड़ देना संभव नहीं है। और कोई कैसे उन्हें प्यार नहीं कर सकता है।
आदमी के मन में
भी क्या अद्भुत विचार आते हैं जब वह अपनी माँ की गोद में सिर रखकर अपने घर की छत
पर लेटा हो।
अपशेरोन का
ज़ालिम सूरज समुद्र के पार नीचे उतर रहा था।