कल अपनी सोसाइटी में इस वर्ष आयोजित गणेशोत्सव में मैंने अनुभव किया कि हमारी मन्दिर और उत्सव परम्परा, कैसे हमारे बच्चों और किशोरों को शिक्षित और संस्कारित करती है, मैने लक्ष्य किया कि छोटे बच्चे, बड़ों का अनुसरण करते हुए , बड़े उत्साह से पूजा और उत्सव कार्यों में भाग ले रहे थे, साथ ही स्वयं और स्वार्थ को पीछे रख, सभी को प्रसाद बाँटने में आनंद ले रहे थे.
सोसाइटी की कोई अन्नपूर्णा (गृहणी) श्रद्धा और यत्नपूर्वक अपनी रसोई से प्रसाद बना कर और देव प्रतिमा के निकट अर्पण करके धन्य और संतुष्ट प्रतीत होती थी।
सब के साथ बाँटने का, औरों के लिए कुछ कर के धन्य और कृतार्थ अनुभव करने का, सेवा , परस्पर सहयोग और उससे उपजे आनंद का सहज अवसर उत्पन्न कराती इस मंदिर और उत्सव परंपरा को प्रणाम करने का मन हो आया.
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